Why the colorful Holi is better than the bon fire Holi ?

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I think the basic reason for our economic and social problems is our negative thinking. On the contrary, our neighbour Japan is just the opposite. There, every person gives more importance to the moral values. Every person looks at the life with a nationalist view and is full of gratitude.
Normally either people talk about the magnificence of ancient India or they are seen giving suggestions about the problems of modern India in Present times. For a long time I have been thinking that this is such a paradox. On the one hand we talk about being the (Vishwa guru) the masters of the world, on the other hand we find that this country is divided into 565 Dynasties. Even today we find individualistic thinking. Every person seem to be thinking only about himself. Actually if we look at the basis of social, economic and political problems we find that the biggest problem is negative thinking. Keeping this view in mind if we look at the pillars of democracy like legislature, executive, judiciary or Journalism we find that every leader is busy criticizing the other person and focuses at the weaknesses. Whether you visit the secretariat or collect orate we find that every person is busy finding excuses for not doing anything. When we look at bureaucracy we find that administrative officers who get big positions with fat salaries are given this position so that they can take decisions in favour of our country but unfortunately either these people do not allow the work to be done or they find reason to not to do the work. For their petty personal benefits they don’t mind the bigger loss of the country. We all know that passivity or pessimistic thinking never helps any country, nor does it allow the country to grow. You must have hardly heard one leader or a bureaucrat praising anyone else.
I think the basic reason for our economic and social problems is our negative thinking. On the contrary, our neighbour Japan is just the opposite. There, every person gives more importance to the moral values. Every person looks at the life with a nationalist view and is full of gratitude. No matter how many number of materialistic things we may collect, the element of our success will be prominent only if we start thinking positively. Negative thinking starts from childhood. When the child is very young, first the parents start scaring him, then the teachers scare him in the school or college where he studies. Finally the place where he works, his employers do the same thing.
Actually there are two ways of working. One is the way of fear and the other is love. Just because the path of love is little more difficult, the person has to develop himself. On the other hand path of fear is easy so people find it convenient to choose the option of scaring others. Fear gives birth to anger, worries and greed.
So, now let us look at two day festival of Holi from the emotional point of view. Day one of holi is the day where we burn are negativity into the bonfire of Holika. Holika wanted to burn Prahlad because of her anger and jealousy but actually Prahlad never got burnt. So, only that thing gets burnt which is supposed to burn not everything.

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आत्मविश्वास बढ़ता है जब आप दूसरों को प्रोत्साहित करते है।

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एक बच्चे के समान ताली बजाकर स्वयं को ऊर्जावान कीजिए। अपने आसपास के लोगों पर ध्यान दीजिए। यदि वे मुस्कुरा रहे है तो वे सभी ऊर्जावान है और यदि वे दुखी है उनमें ऊर्जा निम्नतम स्तर पर है। जब आप दुखी होते है तो आप सर्वाधिक ऊर्जा खर्च कर रहे होते हैं यह ऐसा है जैसे कि आपने मोबाइल का गूगल मैप सर्च करना शुरू कर दिया हो जिसके कारण आपको कोई दूसरी महत्त्वपूर्ण सूचना प्राप्त नहीं हो रही है तथा मोबाइल की बैट्री तेजी से खर्च होने लग गई हो।
यदि आप उच्च ऊर्जा स्तर पर जीना चाहते हैं तो एक शिशु के समान मुस्कराइए और ताली बजाइए जो एक अच्छी ध्वनि उत्पन्न करती है। ध्वनि हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ध्वनि मस्तिष्क को संदेश भेजती है और मस्तिष्क की तंत्रिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं तथा स्पंदन उत्पन्न करती हैं। इस स्पंदन से ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि ध्वनि प्रभावशाली नहीं है तो यह नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा जिसके कारण हमारे कार्य समुचित रूप से नहीं होंगे और यदि ध्वनि सौम्य, शक्तिशाली और सकारात्मक होगी तो यह सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगी और हमारे कार्य समुचित रूप से होंगे। हमारे आस-पास जो भी अच्छा कार्य हो रहा हो उसे प्रोत्साहन देने के लिए ताली बजाना ना भूलें।
आइए! हम प्रतिदिन अपना मूल्यंाकन स्वयं करंे तभी हम महान् कार्य कर सकंेगे। स्वयं का आकलन स्वयं कीजिए और अपने जीवन में ईमानदारी को स्थान दीजिए। स्वप्न लीजिए और स्वप्न पूर्ण करने हेतु कठिन परिश्रम कीजिए। आइए हम समय व्यर्थ न करें। कार्य के समय कार्य करें और खेल के समय खेले। आलोचना बंद करे और परिस्थितियों को बिना दूसरों को दोष दिए स्वीकार करें। स्वयं, अपने माता-पिता और अपने गुरूजनों पर विश्वास करें और उन्हे लगातार धन्यवाद देने का भाव बनाएं।

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ईश्वर और प्रकृति पूर्ण (perfect) हैं

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मस्तिष्क अत्यंत शक्तिशाली है। आइए हम जानें कि हमारा मस्तिष्क किस प्रकार कार्य करता है- सर्वप्रथम जब हम सुनते है तो मस्तिष्क में बिम्ब बनता है। यदि मस्तिष्क एकाग्रचित होता है तो यह इच्छा शक्ति का विकास कर लेता है। यदि मस्तिष्क इच्छुक नहीं हो तो आपको कोई संदेश याद नहीं रह पाएगा। आपकों यह ज्ञात होना चाहिए कि समुचित रूप से कुछ भी कैसे याद रखा जाए और परीक्षा के समय सही उत्तर कैसे दिया जाए? हमारी क्या कमजोरियाँ है ? हमें परीक्षा में कम अंक क्यों प्राप्त होते हैं ? हम सैद्धान्तिक सामग्री क्यों नहीं याद रख पाते ? एकाग्रता की कमी के कारण हम जीवन में इच्छित उपलब्धि नहीं ले पाते। best motivational speaker
चलिए हम मस्तिष्क को प्रशिक्षित करते है। एक प्रभावशाली मंत्र का बार-बार उच्चारण करते हैं। उच्चारण करते समय मस्तिष्क में कोई और विचार न लाएँ। इसे तीन बार उच्चारित कीजिए। पुनरावृत्ति आवश्यक है।
परन्तु पुनरावृत्ति के समय यदि आप यही सोचते रहते हैं कि मैं याद नहीं रख सकता, मैं परीक्षा के समय उत्तर भूल जाऊंगा तो ऐसा वास्तव में होगा। इन नकारात्मक विचारां के कारण हमारी संकल्प शक्ति क्षीण हो जाती है जब कि हमारे बीच अधिकांश लोग प्रतिभावान है । हम पूर्णतः सामान्य हैं। अब हम अपनी बौद्धिक शक्ति का परीक्षण करते हैं। हमस्वयं पर ध्यान केंद्रित करें और सर्वप्रथम निम्न मंत्र का अर्थ समझेंगे फिर इसकी पुनरावृत्ति इस आत्मविश्वास के साथ करेंगे कि हम इसे सही-सही रूप से बोल सकते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इसका मतलब यह है कि प्रकृति पूर्ण (perfect) है जिसे हम बाहरी दुनिया कहते हैं साथ ही साथ हमारे अन्दर की चेतना भी पूर्ण (perfect) है। जिसे हम आत्मा, परमात्मा, ईश्वर और आन्तरिक शक्ति के रूप में जानते है। इस दिव्य शक्ति से ही सब सृजन हो रहा है।

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कर्म का फल एक दिन अवष्य भुगतना होता है।

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क्या आपने कभी सोचा है कि कभी-कभी जब आप कोई कार्य करना नहीं चाहते तो भी आपको कौनसी शक्ति ऐसा करने हेतु बाध्य करती है? मेरे विचारानुसार, यह कर्म का नियम है जो हमें समस्त कार्य स्वेच्छा से या कभी-कभी अनिच्छा से करने हेतु बाध्य करता है। कर्म के नियम से कोई मुक्त नहीं रह सकता। दुर्योधन ने भी कहा था, ‘‘मैं कर्म के सिद्धान्त का सार जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि क्या सही है और क्या गलत, किन्तु फिर भी मैं अज्ञात शक्तियां द्वारा कर्म करने हेतु बाध्य किया जाता हँ‘‘ कर्मयोग से बचने के लिए यहाँ संसार में कोई साधन नहीं है साथ ही हम अपने किए हुए कर्म को कही नहीं छिपा सकते है।
एक बार एक राजा ने अपने तीनों पुत्रों की परीक्षा लेने का विचार किया। इस हेतु उसने तीनों को एक-एक तोता दिया और कहा कि अपने-अपने तोते को ऐसी जगह ले जाकर मारो, जहाँ ऐसा करते हुए आपको कोई नहीं देख सके और आकर सूचित करो। कुछ समय पश्चात् दो पुत्र वापस आए और कहा कि उन्होनें तोतों को वहाँ मारा जहाँ कोई उन्हें नहीं देख रहा था। किन्तु तीसरा पुत्र अपने जीवित तोते के साथ ही लौटा।
राजा ने आष्चर्यपूर्वक पूछा कि क्या तुम्हें एक भी स्थान ऐसा नहीं मिला, जहाँ तुम स्वयं को मिली चुनौती को पूर्ण कर पाते, उसने कहा, ‘‘नहीं पिताजी, जब मैं गुफा में गया तब वहाँ कोई नहीं था, मात्र अँधेरा था, किन्तु वहाँ भी मुझे तोते की चमकती हुई आँखें दिखाई दे रही थी, जो मुझे देख रही थी।
इस कहानी से तात्पर्य है- ‘‘आप अपने कर्मफल से नहीं बच सकते। आप जहाँ भी जाते हैं, जो कुछ भी करते हैं, आपके कर्म ही आपको शांतिपूर्वक देख रहे होते हैं। किसी भी दिन आपको आपके कर्म का फल पृथ्वी पर वहन करना ही होता है।
आइए! अपने कर्मफल का आनन्द लें। आइए! अच्छे कर्म करें। समस्याओं एवं दुःख की परिस्थिति में अन्य को दोष न देकर अपने कर्म फल को स्वीकार करें।
भविष्य, हमारे भूतकालीन कार्यों का परिणाम ही है। आज हम हमारे बीते हुए कल के कर्मों का फल वहन कर रहे हैं। परन्तु हम अच्छे कार्य करके, अच्छा सोेचकर तथा मानवता की सेवा करके, बुरे कर्मो के प्रभाव को परिवर्तित कर सकते हैं।
अच्छे कार्य करते रहिए और दूसरों से शुभकामनाएँ प्राप्त करते रहिए, यही कर्म के नियम का समाधान है।

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Get up And Grab The “Oar”

It is not what transpires, but rather how we respond that represents the deciding moment us. Life tosses things at us when we wouldn’t dare hoping anymore, things are awesome, others are troublesome.

It is interesting to watch the distinction in people groups’ responses and how a few people can discover great in fundamentally anything, a silver coating in each cloud.

Others go into disrepair when troublesome conditions emerge, trusting they are being exploited and demonstrating little imperiousness to the current circumstance.

 

Note that the constructive individuals are not the ones who spout inspiration throughout the day and night, going over the top about existence and how magnificent it treats them.

That is only a stage too far, I’m discussing realists who experience their day with a glass half full approach, picking not to tumble down when things don’t go to arrange or a curveball takes off before them when minimum anticipated.

We’d all adoration to be this way and here’s the way how. We have to get up and snatch the OAR. “What the hell does that mean?” you may inquire. All things considered, I was demonstrated an acronym at a course as of late and I observed it to be most capable and savvy device I had gone over in quite a while.

We all have days when we wake up and want the day to be over, believing that it’s going to go from bad to worse. That’s the day when we get soaked in the rain, forget the mobile, are late for work and seem to have one problem after another when we do get there.

This we can name a red light day. Then there are green light days when we wake up energized and positive, the sun shines and we are productive in work with next to no hiccups.

To be glad in life our objective ought to be to live a greater amount of life over the line. This makes life less demanding, and gives an individual flexibility. The best approach to do this is to pose a couple of inquiries.

* Am I searching for somebody to fault when things don’t go to arrange?

* Am I rationalizing?

* What avocations am I utilizing to get me free?

* What am I trying to claim ignorance about and what is truly occurring here?

Be straightforward with yourself regardless of the possibility that it is difficult. You have to uncover your underneath the line practices and take a gander at what parts of your life they are influencing.

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Improve Your Today than Yesterday

Might you want to construct a superior tomorrow? The best approach to do that is extremely basic. Attempt this strategy – make it a propensity to improve today than yesterday. Attempt to make the day before you only somewhat superior to the day that has recently passed. Doing this is not troublesome by any stretch of the imagination. Before long it will end up being a propensity. As it turns into a propensity, you will have the capacity to improve your today than yesterday. Consider it.

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What happens when tomorrow comes? At the point when tomorrow turns out to be today and you are attempting to improve it than yesterday, you are unquestionably constructing a superior tomorrow. It’s an exceptionally straightforward rationale yet individuals don’t comprehend it. Attempt it. Take a stab at improving your today than yesterday and afterward you will end up building a superior tomorrow.

About Author

A dynamic multifaceted young educationist, youth motivator, author and a entrepreneur with over 22 year of teaching experience at PG and UG level. The far reaching objective is to empower women and youth through technical education and believes that there is tremendous scope in each and every youth with hidden potential talent which can be explored through proper counseling.

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