आत्मविश्वास बढ़ता है जब आप दूसरों को प्रोत्साहित करते है।

16

एक बच्चे के समान ताली बजाकर स्वयं को ऊर्जावान कीजिए। अपने आसपास के लोगों पर ध्यान दीजिए। यदि वे मुस्कुरा रहे है तो वे सभी ऊर्जावान है और यदि वे दुखी है उनमें ऊर्जा निम्नतम स्तर पर है। जब आप दुखी होते है तो आप सर्वाधिक ऊर्जा खर्च कर रहे होते हैं यह ऐसा है जैसे कि आपने मोबाइल का गूगल मैप सर्च करना शुरू कर दिया हो जिसके कारण आपको कोई दूसरी महत्त्वपूर्ण सूचना प्राप्त नहीं हो रही है तथा मोबाइल की बैट्री तेजी से खर्च होने लग गई हो।
यदि आप उच्च ऊर्जा स्तर पर जीना चाहते हैं तो एक शिशु के समान मुस्कराइए और ताली बजाइए जो एक अच्छी ध्वनि उत्पन्न करती है। ध्वनि हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ध्वनि मस्तिष्क को संदेश भेजती है और मस्तिष्क की तंत्रिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं तथा स्पंदन उत्पन्न करती हैं। इस स्पंदन से ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि ध्वनि प्रभावशाली नहीं है तो यह नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगा जिसके कारण हमारे कार्य समुचित रूप से नहीं होंगे और यदि ध्वनि सौम्य, शक्तिशाली और सकारात्मक होगी तो यह सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करेगी और हमारे कार्य समुचित रूप से होंगे। हमारे आस-पास जो भी अच्छा कार्य हो रहा हो उसे प्रोत्साहन देने के लिए ताली बजाना ना भूलें।
आइए! हम प्रतिदिन अपना मूल्यंाकन स्वयं करंे तभी हम महान् कार्य कर सकंेगे। स्वयं का आकलन स्वयं कीजिए और अपने जीवन में ईमानदारी को स्थान दीजिए। स्वप्न लीजिए और स्वप्न पूर्ण करने हेतु कठिन परिश्रम कीजिए। आइए हम समय व्यर्थ न करें। कार्य के समय कार्य करें और खेल के समय खेले। आलोचना बंद करे और परिस्थितियों को बिना दूसरों को दोष दिए स्वीकार करें। स्वयं, अपने माता-पिता और अपने गुरूजनों पर विश्वास करें और उन्हे लगातार धन्यवाद देने का भाव बनाएं।

best motivational speaker, best personal counselling in jaipur, online student counselling, best motivational blog and editorial

 

Advertisements

ईश्वर और प्रकृति पूर्ण (perfect) हैं

14

मस्तिष्क अत्यंत शक्तिशाली है। आइए हम जानें कि हमारा मस्तिष्क किस प्रकार कार्य करता है- सर्वप्रथम जब हम सुनते है तो मस्तिष्क में बिम्ब बनता है। यदि मस्तिष्क एकाग्रचित होता है तो यह इच्छा शक्ति का विकास कर लेता है। यदि मस्तिष्क इच्छुक नहीं हो तो आपको कोई संदेश याद नहीं रह पाएगा। आपकों यह ज्ञात होना चाहिए कि समुचित रूप से कुछ भी कैसे याद रखा जाए और परीक्षा के समय सही उत्तर कैसे दिया जाए? हमारी क्या कमजोरियाँ है ? हमें परीक्षा में कम अंक क्यों प्राप्त होते हैं ? हम सैद्धान्तिक सामग्री क्यों नहीं याद रख पाते ? एकाग्रता की कमी के कारण हम जीवन में इच्छित उपलब्धि नहीं ले पाते। best motivational speaker
चलिए हम मस्तिष्क को प्रशिक्षित करते है। एक प्रभावशाली मंत्र का बार-बार उच्चारण करते हैं। उच्चारण करते समय मस्तिष्क में कोई और विचार न लाएँ। इसे तीन बार उच्चारित कीजिए। पुनरावृत्ति आवश्यक है।
परन्तु पुनरावृत्ति के समय यदि आप यही सोचते रहते हैं कि मैं याद नहीं रख सकता, मैं परीक्षा के समय उत्तर भूल जाऊंगा तो ऐसा वास्तव में होगा। इन नकारात्मक विचारां के कारण हमारी संकल्प शक्ति क्षीण हो जाती है जब कि हमारे बीच अधिकांश लोग प्रतिभावान है । हम पूर्णतः सामान्य हैं। अब हम अपनी बौद्धिक शक्ति का परीक्षण करते हैं। हमस्वयं पर ध्यान केंद्रित करें और सर्वप्रथम निम्न मंत्र का अर्थ समझेंगे फिर इसकी पुनरावृत्ति इस आत्मविश्वास के साथ करेंगे कि हम इसे सही-सही रूप से बोल सकते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इसका मतलब यह है कि प्रकृति पूर्ण (perfect) है जिसे हम बाहरी दुनिया कहते हैं साथ ही साथ हमारे अन्दर की चेतना भी पूर्ण (perfect) है। जिसे हम आत्मा, परमात्मा, ईश्वर और आन्तरिक शक्ति के रूप में जानते है। इस दिव्य शक्ति से ही सब सृजन हो रहा है।

best motivational blog and editorial in jaipur, counselling for depression/stress/tension, best personal counselling in jaipur, online student counselling 

 

प्रेम एक चमत्कारिक एवं सार्वभौमिक शब्द है।

9

अपनी प्रत्येक सुबह को आनन्दमय बनाइए। प्रतिदिन इसका स्वागत जोषपूर्ण होना चाहिए। हमें जीवन के प्रत्येक पल का आनन्द लेना चाहिए। जीवन का महत्वपूर्ण तत्त्व आपसी ’संबंध’ है। जो कि व्यक्ति में उत्साह एवं ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाते है, ऐसा तभी होता है जब पारस्परिक संबंध प्रेमपूर्ण एवं निःस्वार्थ हों। षिक्षक-विद्यार्थी संबंध एक सम्मानीय और प्रेमपूर्ण संबंध है। अध्यापन कार्य विद्यार्थी केन्द्रित होना अत्यन्त आवश्यक है, जो शिक्षक का विद्यार्थी के प्रति अगाध प्रेम दर्षाता है।
प्रेम सार्वभौमिक शब्द है। प्रेम चमत्कारी है। प्रकृत्ति हमें बिना किसी शर्त के प्रेम करती है। वर्षा हमें बिना किसी शर्त के प्रेम करना सिखाती है। यह प्रत्येक जीव को समान रूप से जल प्रदान करती है, प्रत्येक खेत में समान रूप से जल-वर्षा करती है। पृथ्वी हमें समान रूप से अन्न प्रदान करती है । पवन सभी स्थानों पर समान रूप से बहती है। ये सभी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करतेे। सम्पूर्ण ब्रम्ह्ाण्ड प्रत्येक जीव को सार्वभौमिक रूप से बिना किसी जाति, वर्ग और धर्म संबंधी भेदभाव के प्रेम करता है।
दूसरों के प्रति दयाभाव रखिए। एक अच्छा सामाजिक संगठन बनाने का प्रयास कीजिए। जितना अधिक आप दूसरों को महत्व देंगे उतने ही अधिक मूल्यवान संबंध आप प्राप्त करेंगे। आप दूसरों को नहीं बदल सकते, आप स्वयं को ही बदल सकते हैं। लोगों की खुलकर प्रषंसा कीजिए। कृतज्ञ बनिए। प्रतिदिन नई बातें सीखिए। स्वयं में तथा ईष्वर में विष्वास रखिए।
संसार का एक सार्वभौमिक नियम है। जितना अधिक आप देते हैं, उतना अधिक आप प्राप्त करते हैं। किन्तु देने के पीछे मात्र षर्तहीन प्रेम का उद्देष्य होना चाहिए। इसके लिए आपको किसी भी प्रकार के लाभ की प्राप्ति के बारे में सोचे बिना निरन्तर देते रहने का भाव रखना होगा। मात्र इसी आधार पर आप मूल्यवान संबंध विकसित कर सकते है, जो लंबे समय तक चल पाएंगे और आपको कभी पछताना नही पड़ेगा।

counselling for mba,bba,ca,cs,mca,bca, best motivational blog and editorial, counselling for depression/stress/tension in jaipur, best motivational speaker, career after 12th graduation

अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है।

8

आइए! हम कुरूक्षेत्र के दृष्य को याद करते हैं, जहाँ संसार के परम गुरू श्री कृष्ण एक अनुभवी व्यक्त्ति दुर्योधन को समझाने और सिखाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास करते हैं, परंतु पूर्णतः सफल नहीं हो पाते। श्री कृष्ण कुंती, गांधारी और धृतराष्ट्र को भी समझाने में सफल नहीं हो पाए।
यही वर्तमान में हमारे साथ भी हो रहा है, जब हम दूसरों को समझाने का प्रयास करते हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाते हैं। न तो हम उन्हें समझा पाते हैं, न हम इस असफलता का कारण समझ पाते हैं।
अतः प्रष्न यह उठता है कि हम हमारे समक्ष उपस्थित व्यक्त्ति को क्यों नहीं समझा पाते हैं और वह व्यक्त्ति समझने में क्यों सक्षम नहीं होता। यह समझना अति आवष्यक है और दूसरों को समझाना भी। किन्तु दोनों ही अत्यंत कठिन कार्य हैं। आप देखेंगें कि एक बीज को उगने के लिए उपयुक्त वातावरण आवष्यक होता है। एक बीज को बोने का एक उचित समय होता है। जब बीज को विषेष तापमान, प्रभावषाली वातावरण, समुचित जल की उपलब्धि होती है तभी वह अंकुरित होंगा और एक वृक्ष के रूप में अभिवृद्ध होगा। बीज बोने के बाद यदि अत्यंत भारी वर्षा हो जाती है तो यह संपूर्ण बीज को नष्ट कर देगी। इस स्थिति में क्या करना चाहिए? हमें उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए और तब तक प्रयास करते रहना चाहिए जब तक हम उचित वातावरण प्राप्त नहीं कर लेते।
अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है। यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण और कठिन कार्य है। अध्यापकों को न केवल पुस्तक से बल्कि स्वयं एक उदाहरण बनकर पढ़ाने एवं सिखाने के लिए निरन्तर प्रयास करना चाहिए। अध्यापकों से विद्यार्थी प्रेेम ओर स्नेह की अपेक्षा करते हैं। वे अध्यापक के मात्र आंतरिक सौन्दर्य की प्रषंसा करते है और उसी से सीखते भी हैं।
एक षिक्षक अपने स्नेहपूर्ण एवं संरक्षणपूर्ण व्यवहार से आकर्षक बनता है न कि बाह्य रूप से। सौंदर्य आंतरिक होता है, यदि आप आंतरिक रूप से अच्छे हैं तो यह आपकी अच्छी प्रवृति को दर्षाता है। इसीलिए 70 वर्ष की आयु में भी आपके दादा-दादी का व्यक्तित्व आपको बहुत आकर्षक लगता है।
इसी कारण पूर्व राष्ट्रपति प्रो. अब्दुल कलाम आजाद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मदर टेरेसा जैसे महान व्यक्तित्व भी हमारी दृष्टि में सुंदर हैं क्योंकि ये सभी विनम्रता से परिपूर्ण हैं। किसी महान व्यक्ति का आंतरिक सौंदर्य हमें अत्यधिक ऊर्जावान एवं सकारात्मक बना देता है। इस आंतरिक सौंदर्य को कैसे विकसित किया जाए? इसका एक ही तरीका है -‘धन्यवाद‘ कहना । जितनी बार जितने अधिक लोगोें को आप धन्यवाद कह सके, कहिये और अपने मन को सुंदर बनाइये। जब कभी आप महसूस करें कि आपकी गलती है तुरन्त ‘क्षमा मांगिए। कभी-कभी तब भी क्षमा मांगिए जब आपने कुछ भी गलत नहीं किया। आपका ‘क्षमा’ शब्द (Sorry) जीवन की कई समस्याएं सुलझा सकता है। यह आपको अधिक विनम्र बनाएगा। यह आपके व्यक्तित्व को अधिक गरिमामय बनाएगा और आपके मन को सौंदर्य प्रदान करेगा।

best motivational blog and editorial, career 12th graduation, online student counselling,  best motivational speaker

चाणक्य के मूल्यवान सिद्धान्त

5

महान विद्वान चाणक्य ने कुछ मूल्यवान सिद्धान्त दिए थे जो कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के अच्छे मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। आइए! आज हम चाणक्य के कुछ बहुमूल्य सिद्धान्तों की चर्चा करते है और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं।
प्रथम सिद्धान्त- संघर्ष में विजय प्राप्ति हेतु आपके लिए आवश्यक है –
1 दृढ़ संकल्प
2 पहले से ही पूर्णतः तैयार हो जाना
3 इच्छा शक्ति जो किसी भी संघर्ष में विजयी होने के लिए अपरिहार्य एवं पर्याप्त साधन है।
दूसरा सिद्धान्त- सफलता प्राप्ति हेतु आपके लिए आवष्यक हैः-
4 चमत्कारिक शब्दों में आस्था रखना। किन्तु दूसरों के मत या बातों में बिना विचारे विष्वास मत कीजिए पवित्र ग्रंथों या गुरूओं के द्वारा ऐसा ही बोला गया है। केवल उसी पर विष्वास कीजिए जो आपने अनुभव किया है, जो तार्किक है, जो आपके द्वारा पूर्ण परीक्षित है और जो मानवता के लाभार्थ हो और जो अधिक लोगों के लिए प्रसन्नता ला सकें।
जीवन में प्रसन्नता अत्यंत आवष्यक है। यदि यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से श्रेष्ठ है तो यह अवष्य स्वीकार किया जाना चाहिए।
तीसरा सिद्धान्त- विफलता के भय से मुक्ति पाने हेतु आपके लिए आवष्यक है-
5 एक अच्छी योजना का निर्माण और अपनी योजना पर पूर्ण विष्वास रखना। यदि योजना श्रेष्ठ है तो निर्णय भी श्रेष्ठ होगा। तीव्र आस्था और समर्पण से युक्त श्रेष्ठ योजना असंभव को संभव में रूपान्तरित कर सकती है। आषावादी प्रत्येक परिस्थिति में संभावना ढ़़ँूढ़ लेता है। निराषावादी प्रत्येक परिस्थिति में विफल होता है। सफलता और विफलता व्यक्त्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। आइए! अपनी शक्ति का पूर्ण प्रयोग करें। आइए! संभावनाआंे से युक्त बनं।
श्रेष्ठ विचारों के द्वारा हम श्रेष्ठ कार्य कर सकते हैं। एक श्रेष्ठ षिक्षक कई विद्यार्थियोें में परिवर्तन ला सकता है। एक उचित शैक्षिणिक वातावरण के लिए हमें रचनात्मक बनना चाहिए। श्रेष्ठ विचार ही हमारे लिए श्रेष्ठ वातावरण का निर्माण करते हैं। हम चाणक्य के समान एक आत्मविष्वासी षिक्षक बन सकते हैं और अपने षिक्षण को प्रभावी बना सकते हैं, यदि हम निम्नलिखित बातें अपने जीवन में अपनाते हैं-
 शिक्षण की समुचित तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 पाठ्य सामग्री पहले से ही समुचित रूप से तैयार कर लेनी चाहिए।
 शिक्षण प्रक्रिया में परिवर्तन हेतु उचित पद्धति अत्यंत आवष्यक है।
 आपका अपने विषय पर प्रगाढ़ नियंत्रण हो।
 आप आत्मविष्वास से युक्त हो।
 आप में साहस और अधिकारपूर्वक ज्ञान वितरण करने की पूर्ण क्षमता हो।
 आपके विचार मौलिक हांे जिन्हें रचनात्मक रूप से समझना संभव हो।
श्रद्धा अत्यंत शक्तिषाली है। यदि आप स्वयं को एवं अपने विद्यार्थियों को जानते हैं तो आप अपना शत प्रतिषत दे पाएंगें। विद्यार्थियों की मानसिकता को समझना अतिआवष्यक है। चाणक्य उन महान षिक्षकों में से एक है, जिन्होंने अपने षिष्यों को प्रभावी व आत्मविष्वासपूर्वक ज्ञान व निर्देषन प्रदान किया। हम उनके सिद्धांतों से सीखकर एक सफल षिक्षक बन सकते है। षिक्षक संपूर्ण समाज को रूपांतरित कर सकते है। यह संभव है यदि हमारे मस्तिष्क के प्रयोग द्वारा आत्मविष्वासपूर्वक अधिकाधिक ज्ञान का उद्भव हो। षिक्षकों में उत्साह, इच्छा शक्ति और दिए गए पाठ्यक्रम से अधिक प्रदान करने की मंषा होनी चाहिए।

best motivational blog and editorial, counselling for depression/stress/tension, career after 12th graduation, best motivational speaker

कर्म का फल एक दिन अवष्य भुगतना होता है।

4

क्या आपने कभी सोचा है कि कभी-कभी जब आप कोई कार्य करना नहीं चाहते तो भी आपको कौनसी शक्ति ऐसा करने हेतु बाध्य करती है? मेरे विचारानुसार, यह कर्म का नियम है जो हमें समस्त कार्य स्वेच्छा से या कभी-कभी अनिच्छा से करने हेतु बाध्य करता है। कर्म के नियम से कोई मुक्त नहीं रह सकता। दुर्योधन ने भी कहा था, ‘‘मैं कर्म के सिद्धान्त का सार जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि क्या सही है और क्या गलत, किन्तु फिर भी मैं अज्ञात शक्तियां द्वारा कर्म करने हेतु बाध्य किया जाता हँ‘‘ कर्मयोग से बचने के लिए यहाँ संसार में कोई साधन नहीं है साथ ही हम अपने किए हुए कर्म को कही नहीं छिपा सकते है।
एक बार एक राजा ने अपने तीनों पुत्रों की परीक्षा लेने का विचार किया। इस हेतु उसने तीनों को एक-एक तोता दिया और कहा कि अपने-अपने तोते को ऐसी जगह ले जाकर मारो, जहाँ ऐसा करते हुए आपको कोई नहीं देख सके और आकर सूचित करो। कुछ समय पश्चात् दो पुत्र वापस आए और कहा कि उन्होनें तोतों को वहाँ मारा जहाँ कोई उन्हें नहीं देख रहा था। किन्तु तीसरा पुत्र अपने जीवित तोते के साथ ही लौटा।
राजा ने आष्चर्यपूर्वक पूछा कि क्या तुम्हें एक भी स्थान ऐसा नहीं मिला, जहाँ तुम स्वयं को मिली चुनौती को पूर्ण कर पाते, उसने कहा, ‘‘नहीं पिताजी, जब मैं गुफा में गया तब वहाँ कोई नहीं था, मात्र अँधेरा था, किन्तु वहाँ भी मुझे तोते की चमकती हुई आँखें दिखाई दे रही थी, जो मुझे देख रही थी।
इस कहानी से तात्पर्य है- ‘‘आप अपने कर्मफल से नहीं बच सकते। आप जहाँ भी जाते हैं, जो कुछ भी करते हैं, आपके कर्म ही आपको शांतिपूर्वक देख रहे होते हैं। किसी भी दिन आपको आपके कर्म का फल पृथ्वी पर वहन करना ही होता है।
आइए! अपने कर्मफल का आनन्द लें। आइए! अच्छे कर्म करें। समस्याओं एवं दुःख की परिस्थिति में अन्य को दोष न देकर अपने कर्म फल को स्वीकार करें।
भविष्य, हमारे भूतकालीन कार्यों का परिणाम ही है। आज हम हमारे बीते हुए कल के कर्मों का फल वहन कर रहे हैं। परन्तु हम अच्छे कार्य करके, अच्छा सोेचकर तथा मानवता की सेवा करके, बुरे कर्मो के प्रभाव को परिवर्तित कर सकते हैं।
अच्छे कार्य करते रहिए और दूसरों से शुभकामनाएँ प्राप्त करते रहिए, यही कर्म के नियम का समाधान है।

best motivational speaker, online student counselling, counselling for depression/ stress/ tension, best motivational blog and editorial