अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है।

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आइए! हम कुरूक्षेत्र के दृष्य को याद करते हैं, जहाँ संसार के परम गुरू श्री कृष्ण एक अनुभवी व्यक्त्ति दुर्योधन को समझाने और सिखाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास करते हैं, परंतु पूर्णतः सफल नहीं हो पाते। श्री कृष्ण कुंती, गांधारी और धृतराष्ट्र को भी समझाने में सफल नहीं हो पाए।
यही वर्तमान में हमारे साथ भी हो रहा है, जब हम दूसरों को समझाने का प्रयास करते हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाते हैं। न तो हम उन्हें समझा पाते हैं, न हम इस असफलता का कारण समझ पाते हैं।
अतः प्रष्न यह उठता है कि हम हमारे समक्ष उपस्थित व्यक्त्ति को क्यों नहीं समझा पाते हैं और वह व्यक्त्ति समझने में क्यों सक्षम नहीं होता। यह समझना अति आवष्यक है और दूसरों को समझाना भी। किन्तु दोनों ही अत्यंत कठिन कार्य हैं। आप देखेंगें कि एक बीज को उगने के लिए उपयुक्त वातावरण आवष्यक होता है। एक बीज को बोने का एक उचित समय होता है। जब बीज को विषेष तापमान, प्रभावषाली वातावरण, समुचित जल की उपलब्धि होती है तभी वह अंकुरित होंगा और एक वृक्ष के रूप में अभिवृद्ध होगा। बीज बोने के बाद यदि अत्यंत भारी वर्षा हो जाती है तो यह संपूर्ण बीज को नष्ट कर देगी। इस स्थिति में क्या करना चाहिए? हमें उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए और तब तक प्रयास करते रहना चाहिए जब तक हम उचित वातावरण प्राप्त नहीं कर लेते।
अध्यापन एक सरल कार्य नहीं है। यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण और कठिन कार्य है। अध्यापकों को न केवल पुस्तक से बल्कि स्वयं एक उदाहरण बनकर पढ़ाने एवं सिखाने के लिए निरन्तर प्रयास करना चाहिए। अध्यापकों से विद्यार्थी प्रेेम ओर स्नेह की अपेक्षा करते हैं। वे अध्यापक के मात्र आंतरिक सौन्दर्य की प्रषंसा करते है और उसी से सीखते भी हैं।
एक षिक्षक अपने स्नेहपूर्ण एवं संरक्षणपूर्ण व्यवहार से आकर्षक बनता है न कि बाह्य रूप से। सौंदर्य आंतरिक होता है, यदि आप आंतरिक रूप से अच्छे हैं तो यह आपकी अच्छी प्रवृति को दर्षाता है। इसीलिए 70 वर्ष की आयु में भी आपके दादा-दादी का व्यक्तित्व आपको बहुत आकर्षक लगता है।
इसी कारण पूर्व राष्ट्रपति प्रो. अब्दुल कलाम आजाद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मदर टेरेसा जैसे महान व्यक्तित्व भी हमारी दृष्टि में सुंदर हैं क्योंकि ये सभी विनम्रता से परिपूर्ण हैं। किसी महान व्यक्ति का आंतरिक सौंदर्य हमें अत्यधिक ऊर्जावान एवं सकारात्मक बना देता है। इस आंतरिक सौंदर्य को कैसे विकसित किया जाए? इसका एक ही तरीका है -‘धन्यवाद‘ कहना । जितनी बार जितने अधिक लोगोें को आप धन्यवाद कह सके, कहिये और अपने मन को सुंदर बनाइये। जब कभी आप महसूस करें कि आपकी गलती है तुरन्त ‘क्षमा मांगिए। कभी-कभी तब भी क्षमा मांगिए जब आपने कुछ भी गलत नहीं किया। आपका ‘क्षमा’ शब्द (Sorry) जीवन की कई समस्याएं सुलझा सकता है। यह आपको अधिक विनम्र बनाएगा। यह आपके व्यक्तित्व को अधिक गरिमामय बनाएगा और आपके मन को सौंदर्य प्रदान करेगा।

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